तुलसीदास की 523वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई

प्रतापगढ़ सर्वोदय सद्भावना संस्थान द्वारा रामानुज आश्रम में विगत वर्षों की भांति संत शिरोमणि संत गोस्वामी तुलसीदास की 523वीं  जयंती धूमधाम से मनाई गई ।   इस अवसर पर ठाकुर जी की सेवा करने ,श्रीरामचरितमानस का पूजन करने के पश्चात धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास यदि ना होते तो शायद घर-घर आज राम की चर्चा न होती। आपने अवधी भाषा में श्री रामचरितमानस की रचना करके गांव गलियारे तक प्रभु श्रीराम के महात्म्य को पहुंचा दिया। रामचरितमानस एक ऐसा ग्रंथ है जिसे गांव के खेतों में बैठा हुआ किसान जिस चौपाई को गाता है वही चौपाई बड़े-बड़े महलो में बैठे हुए लोग तथा बड़े-बड़े मंदिरों में बैठे हुए संत महात्मा  गायन करते रहते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना किया उस रामचरितमानस को कागभुसुंडि जी ने नील शिखर के पावन सरोवर तट पर गरुण जी को सुनाई ,मुनि याज्ञवल्क्य ने गंगा यमुना सरस्वती त्रिवेणी के पावन तट पर भारद्वाज जी को श्रवण कराया, आशुतोष भोलेनाथ ने रामचरित कैलाश पर्वत पर माता जगदंबा जी को श्रवण कराया और उसी रामचरितमानस को गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वारा घर-घर में माताएं बहनों से लेकर संत महात्मा श्रवण करा रहे हैं। 
  गोस्वामी जी ने द्वादश ग्रंथों की रचना की जिसमें श्रीरामचरितमानस विनय पत्रिका हनुमान बाहुक जैसे ग्रंथ हमारे जीवन के प्रत्येक क्षण में उपयोगी है। 18 पुराणों में 7 करोड़ महामंत्र लिखे हैं परंतु सबका सार दो अक्षर राम नाम ही परात्पर परब्रह्म मंत्र है। यदि आप अपना और आत्मा का कल्याण चाहते हैं तो राम नाम मंत्र का भजन कीजिए।रामचरितमानस जितना विशाल है उतना ही काव्य की गुरुता से भी पूर्ण है ,यह जब से इस भूतल पर प्रकाशित हुआ तब से आज तक कितने ही विद्वत जन निज निज मत के अनुसार टीका टिप्पणियां करते हुए उपाधियां प्राप्त कर रहे हैं। संवत् 1631 में रामनवमी के दिन जैसा त्रेता युग में राम जन्म के दिन योग था वही योग था, प्रातः काल तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस की रचना प्रारंभ किया जो 2 वर्ष 7 महीने 26 दिन में पूर्ण हुआ। संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन सातों कांड हो गए।
      गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म वैसे तो कुछ लोग कहते हैं कि गोंडा जिले में कोई इटावा में कोई कहते हैं कि बांदा में हुआ था किंतु दास यह शोध कर रहा है कि गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म प्रतापगढ़ के रानीगंज विधानसभा क्षेत्र के राजा पुर नामक ग्राम में हुआ था। वहीं से थोड़ी दूर पर मुनियां दासी जिसने आपका लालन-पालन किया था उस गांव का नाम मुनिपुर है। वहां से थोड़ी दूर पर ही आपके गुरु नरहरि दास जी के नाम पर नरहरपुर गांव है। वाराह क्षेत्र प्रतापगढ़ में स्थित है दास द्वारा जो प्रमाणित हो चुका है। जहां पर 51 शक्तिपीठों में एक मां वाराही देवी सई के पावन तट पर विराजमान हैं। इसी वाराह क्षेत्र में आपके गुरु श्री नरहरि दास जी ने श्री राम कथा आपको श्रवण कराया था। आपका विवाह राजापुर से उत्तर की ओर आपकी पत्नी के नाम पर बसा हुआ रतन मई गांव जो लगभग 10 किलोमीटर दूर है। दोनों ग्रामों के बीच में सई नदी बहती है। जिसे पार करके आप अपनी पत्नी से बरसते पानी में मिलने गए थे। बुंदेलखंड की जितनी भी नदियां हैं उन्हें बरसात क्या किसी समय भी बिना नाव के पार करना बहुत ही मुश्किल है। रत्नावली एक परम विद्वान एवं ज्योतिषी थी, इसलिए उसके कहे हुए वचन के अनुसार आप प्रभु श्री राम की शरण प्राप्त करने के लिए निकल पड़े। 
     सबसे बड़ी प्रामाणिक बात यह है कि जो भाषा इस प्रतापगढ़ के अवध क्षेत्र में बोली जाती है उसी भाषा में श्री रामचरितमानस की रचना आप द्वारा की गई है। श्री रामचरितमानस की रचना इटावा क्षेत्र में बोली जाने वाली गोंडा क्षेत्र में बोली जाने वाली और बांदा बुंदेलखंड में बोली जानी वाली भाषा में कहीं भी नजर नहीं आती है।इसलिए यह प्रमाणित होता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी रानीगंज विधानसभा क्षेत्र के राजापुर गांव में ही अवतरित हुए थे। कार्यक्रम में लॉक डाउन का पालन करते हुए नारायणी रामानुज दासी डॉ अवंतिका पांडे डॉक्टर अंकिता पांडे के अतिरिक्त दूरसंचार के माध्यम से जनपद प्रतापगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार भानु प्रताप त्रिपाठी मराल, आचार्य कमलेश तिवारी, संगम लाल त्रिपाठी भंवर, संतोष दुबे पूर्व सभासद, दिनेश शर्मा प्रतिनिधि मंत्री महेंद्र प्रताप सिंह, आलोक ज्योतिषी, आचार्य दीपक ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किया।

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